Category: My Poems

  • मैं और मेरी तन्हाई

    एक  पलिटीसियन भोला भाला सा लगता  ना  जीजा ना शाला सा आया था देश में पढ़ने को हँसी  मजाक़ में बढ़ने को उसमें आया कुछ तब्दिल्ली …वो बनगया है भीगी बिल्ली तुमही कहो ये कोई बात हुई एक साइंटिस्ट भोली भाली सी देती सब को मुहं से गाली सी लगती थी मैडम “क्यूँ री?” सी…

  • ख्वाबों के आंगन, ख्वाबों के परछाईआं

    ख्वाबों के आंगन, ख्वाबों के परछाईआं

    सपने टूटगए शीशे के तरह … जो शीशा टूट सक्ती है तो सपने क्यों नहीं ? टूट के बिखर गए … — ख्वाबों के आंगन में, — बटोरने की फुर्सत न मिली ! जीने के वसूलों को … सपनो से मुकम्मल करना … — वह भी एक सपना ! ख्वाबों के परछाईआं … अभी भी…

  • बहत दूर चल दिया है हम ने

    बहत दूर चल दिया है हम ने इस का कोई अंजाम तो होगा मिले  न  मिले  एक  हम-ख़ुशी एक नई सुबह की तलाश मुझ को एक सुबह जो सिखाएगी तिस्नगी ऐसी  प्यार  की  तलाश  है  मुझ को जिस  राह  में मुक्कमल हुए  हैं  कुछ उस  राह की प्यास  है मुझ को सोचने की फुर्सत मिले…

  • वफाएं और दिल्लगी

    वफाएं तो हम से बहत तुने की थी मगर दिल्लगी की याद आ रही थी मिले थे जो तुझ से पेहली दफा हम प्यार बहत कम थी बोर हो रहे थे बोरड़म का तु किस्सा बन गयी थी बोरड़म का तु डब्बा बन गयी है

  • अपने लिए

    एक बुलंदी जो मिलजाती तो मैं एक तारा बन जाता लेकिन अपने कमियों से परेसान रेहता एक हस्र जो मिलजाती तो मैं एक कहानी बन जाता लेकिन अपने तन्हाई से परेसान रेहता एक मंजिल जो मिलजाती तो मैं एक शाह-जहान बन जाता लेकिन अपने सवालों से परेसान रेहता एक सुबह जिसके मिलने से मैं एक…